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समुद्र की मछली by Kunwar Narayan

  समुद्र की मछली   बस वहीं से लौट आया हूँ हमेशा अपने को अधूरा छोड़कर जहाँ झूठ है , अन्याय है , कायरता है , मूर्खता है — प्रत्येक वाक्य को बीच ही में तोड़ - मरोड़कर , प्रत्येक शब्द को अकेला छोड़कर , वापस अपनी ही बेमुरौव्वत पीड़ा के एकांगी अनुशासन में किसी तरह पुनः आरंभ होने के लिए।   अख़बारी अक्षरों के बीच छपे अनेक चेहरों में एक फ़र्क चेहरा अपराधी की तरह पकड़ा जाता रहा बार - बार अद्भुत कुछ जीने की चोर - कोशिश में :   लेकिन हर सज़ा के बाद वह कुछ और पोढ़ा होता गया , वहीं से उगता रहा जहाँ से तोड़ा गया , उसी बेरहम दुनिया की गड़बड़ रौनक़ में गुँजाइश ढूँढ़ता रहा बेहयाई से जीने की। किसी तरह बची उम्र खींचकर दोहरा ले एक से दो और दो से कई गुना , या फिर घेरकर अपने को किसी नए विस्तार से इतना छोटा कर ले जैसे मछली और इस तरह शुरू हो फिर कोई दूसरा समुद्र ..

अंतिम ऊँचाई by Kunwar Narayan

  अंतिम ऊँचाई   कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं ,                 हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले जाना यदि केवल हम चलते होते                बाक़ी सब रुका होता।   मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है।   शुरू - शुरू में सब यही चाहते हैं कि सब कुछ शुरू से शुरू हो , लेकिन अंत तक पहुँचते - पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं। हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती कि वह सब कैसे समाप्त होता है जो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ था                हमारे चाहने पर।   दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए जब तुम अंतिम...