POEM

 

 

 

 

एक



 

 

अंतिम ऊँचाई

 

कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब

अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं,

               हमारे चारों ओर नहीं।

कितना आसान होता चलते चले जाना

यदि केवल हम चलते होते

               बाक़ी सब रुका होता।

 

मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को

दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में

अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है।

 

शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं

कि सब कुछ शुरू से शुरू हो,

लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं।

हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती

कि वह सब कैसे समाप्त होता है

जो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ था

               हमारे चाहने पर।

 

दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए

जब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे

जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब

तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में

               जिन्हें तुमने जीता है

 

जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे

              और काँपोगे नहीं

तब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क़

नहीं सब कुछ जीत लेने में

और अंत तक हिम्मत हारने में।


 

 

 

 

 

समुद्र की मछली

 

बस वहीं से लौट आया हूँ हमेशा

अपने को अधूरा छोड़कर

जहाँ झूठ है, अन्याय है, कायरता है, मूर्खता है

प्रत्येक वाक्य को बीच ही में तोड़-मरोड़कर,

प्रत्येक शब्द को अकेला छोड़कर,

वापस अपनी ही बेमुरौव्वत पीड़ा के

एकांगी अनुशासन में

किसी तरह पुनः आरंभ होने के लिए।

 

अख़बारी अक्षरों के बीच छपे

अनेक चेहरों में एक फ़र्क चेहरा

अपराधी की तरह पकड़ा जाता रहा बार-बार

अद्भुत कुछ जीने की चोर-कोशिश में :

 

लेकिन हर सज़ा के बाद वह कुछ और पोढ़ा होता गया,

वहीं से उगता रहा जहाँ से तोड़ा गया,

उसी बेरहम दुनिया की गड़बड़ रौनक़ में

गुँजाइश ढूँढ़ता रहा बेहयाई से जीने की। किसी तरह

बची उम्र खींचकर दोहरा ले

एक से दो और दो से कई गुना, या फिर

घेरकर अपने को किसी नए विस्तार से

इतना छोटा कर ले जैसे मछली

और इस तरह शुरू हो फिर कोई दूसरा समुद्र..


 

 

 

आपद्धर्मं

 

कभी तुमने कविता की ऊंचाई से

देखा है शहर ?

अच्छे-भले रंगों के नुकसान के वक्त

जब सूरज उगल देता है रक्त

 

बिजली के सहारे रात

स्पन्दित एक घाव स्याह वक्तर पर

जब भागने लगता एक पूँछदार सपना

आँखों मे निकलकर

शानदार मोटरों के पीछे वह आती है।

घर की दूरी से होटल की निकटता तक

लेकिन मुझे तैयार पाकर लौट जाती है।

मेरा ध्यान भटकाकर उस अँधेरे की ओर

जो रोशनी के आविष्कार से पहले था

 

उसकी देह के लचकते मोड़,

बेहाल सड़कों से होकर अभी गुज़रे हैं

कुछ गये गुजरे देहाती ख्याल, जैसे

पनघट, गोरी, बिंदिया वगैरह

और इसी अहसास को मैंने

अक्सर इस्तेमाल से बचाकर

रहने दिया कविता की ऊँचाई पर,

और बदले में मोम की किसी

सजी बनी गुड़िया को

बाहों में पिघलने दिया

जलते-बुझते निऑन-पोस्टरों की तरह

यह सघी-समझी प्रसन्नता

सोचता हूँ

इस शहर और मेरे बीच

किसकी जरूरत बेशर्म है ?

एक और हर सुख की व्यवस्था,

दूसरी ओर प्यार आपद्धर्म है

 

 

 

 

 

 

विकल्प – 1

 

कभी-कभी लगता है अपने ही किसी दुःस्वप्न में क़ैद हूँ

आज से हजारों साल पहले

               और अपराधी नहीं हूँ

 

इस तरह घिरे रहना अकारण

अपराधी होने के भाव से

कहीं मज़बूत करता है मेरे विरुद्ध मेरे ही भयों को

               कि आज भी कड़े पहरे में हूँ

 

कई बार पहले भी मुझे मुक्त किया जा चुका है

दीवारों से, तालों से, चौकीदारों से

लेकिन इस भय से नही छूट पाता कि हर समय

किसी की निगरानी में हूँ

और एक घर की ओर बेतहाशा भागा जा रहा हूँ

 

इस बार भी मुझे छोड़ दिया जायगा

किसी ऐसी जगह ले जाकर जो केवल मेरी यादों में शेष होगी

लेकिन जहां अब मेरी कोई याद शेष होगी।

एक नयी जिन्दगी शुरू करने के लिए

 

एक गुनाह की शर्त और एक लम्बी क़ैद की व्यवस्था के बीच

फिर पकड़े जाने के सिवाय

               मेरे पास कोई दूसरा विकल्प होगा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विकल्प- 2

 

कोई गश्त लगा रहा है मेरी यादों में--

               मैं पहरे में हूँ

कितना भयानक धैर्य है इस एक लय में

जिसके साथ मेरे हृदय की धड़कन

               बंध-सी गयी है

 

उँगलियों के फन्दे बनाकर

जकड़ लिया है मैंने अपने टूटते-बिखरते साहस को

और भरपूर चिल्लाता हूँ : "नजदीक आओ, और नज़दीक,

मैं तुम्हारा

या किसी का

बुरा नहीं चाहता

तुम क्यों मुझे घेरते हो

अपने शकों से ?

 

मुझे एक मनुष्य की तरह पढ़ो, देखो और समझो

ताकि हमारे बीच एक सहज और खुला रिश्ता बन सके

माँद और जोखिम का रिश्ता नही "

 

सहयात्रियो, तुम्हारे स्वार्थ की धमकी

क्या मुझे अक्सर इसी विकल्प की ओर ढकेलती है

कि चलती ट्रेन से बाहर कूद जाऊँ ?


 

 

 

 

 

 

 

जब आदमी आदमी नहीं रह पाता  

 

दरअसल मैं वह आदमी नहीं हूँ जिसे आपने

ज़मीन पर छटपटाते हुए देखा था।

आपने मुझे भागते हुए देखा होगा

दर्द से हमदर्द की ओर।

वक़्त बुरा हो तो आदमी आदमी नहीं रह पाता। वह भी

मेरी ही और आपकी तरह आदमी रहा होगा। लेकिन

आपको यक़ीन दिलाता हूँ

वह मेरा कोई नहीं था, जिसे आपने भी

अँधेरे में मदद के लिए चिल्ला-चिल्लाकर

दम तोड़ते सुना था।

 

शायद उसी मुश्किल वक़्त में

जब मैं एक डरे हुए जानवर की तरह

उसे अकेला छोड़कर बच निकला था ख़तरे से सुरक्षा की ओर,

वह एक फँसे हुए जानवर की तरह

ख़ूँख़ार हो गया था।


 

 

 

 

 

 

 

तब भी कुछ नहीं हुआ

 

तब भी कुछ नहीं हुआ

जिन नंगे तारों को मैंने अकस्मात् छू लिया था

उनमें बिजली नहीं थी

 

मुझे एक झटका लगा कि उनमें बिजली नहीं है

मुझे अकसर एक झटका लगता है

जब वहां बिजली नही होती

जहाँ बिजली को होना चाहिए।

 

मुझे लगता कि मैं शर्म से डूब रहा हूँ

एक चुल्लू पानी में |

 

उनकी हत्या नहीं की गयी

उन्हें इजाजत नही दी गयी कि वे भी हों।

जो उतावले हो रहे थे

खोलते जुलूसों और हंगामों की सतह पर

 

एक बार दाँत उखड़वाते वक्त भी मुझे ऐसा ही

लगा था

कि यह एक दूसरी क्रान्ति की शुरुआत है,

'एक ठण्डी क्रान्ति, जिसमें शर्म थाती है।

दर्द होता है।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शक

 

मैं उन्हें नहीं सुन रहा था ।

मैं उन्हें नहीं देख रहा था ।

मैं उन्हें नहीं बोल रहा था।

 

मैं उनके लिए सो रहा था। मेरा घर

मेरा सामान

मेरे "होने" का असली सबूत नहीं थे ।

 

मुझे अफसोस है

कि मेरे वहाँ 'मोजूद होने' के एक बिल्कुल दूसरे मतलब को

कुछ चोरों के शक ने

नाहक मार डाला ।


 

 

 

 

 

 

 

 

बंधा शिकार

 

कुछ ठहर सा गया है मेरे बिल्कुल पास

मुझे सूंघता हुआ।

किसी भी क्षण

आक्रमण कर सकनेवाली.

एक बर्बर ताकत

वह क्या चाहता है ?

 

क्या है मेरे पास

उसको देने लायक

जिसे उसकी तरफ फेंककर

अपने को बचा लूं ?

 

यह अपनी खुरदुरी देह को रगड़ता है।

मेरी देह से जो अकड़कर वृक्ष हो गयी है

वह कुछ दूर जाकर रुक गया है।

उसे कोई जल्दी नहीं

वह जानता है कि मैं बंधा हूँ

और वह एक खुला शिकारी है 


 

 

 

 

 

 

 

 

 

नयी कक्षा में

 

नयी कक्षा में एक नये सबक़ की शुरुआत

एक साफ़ ब्लैकबोर्ड

जैसे किसी बच्चे का दिमाग़

 

उस पर कुछ लिखते ही

एक बेंत की सड़ाकू से

दो हिस्सों में कट जाते

होश और हवास

 

एक हिस्सा पीठ,

दूसरा सब्र का इतिहास,

दोनों जुड़वों भाइयों की तरह

एक साथ बढ़ते

उम्र ढली

यही सबक पढ़ते !


 

 

 

 

 

अनिश्चय

 

मुझमें फिर एक अनुपस्थिति का शोक है,

और मैं उसमें जिन्दा हूँ

 

एक प्रकारण शुरूआत और प्रकारण मृत्यु के बीच

कहाँ हूँ ?

 

मैं कोमल हुआ था यहीं कहीं जैसे एक फूल

मैं कठोर हो गया हूँ जैसे मेरी यादगार का पत्थर

जड़ता

जैसे अभी आक्रमण करेगी

 

अनेक प्रतीतों और अनेक भविष्यों के बीच

मैंने वर्तमान को कभी-कभी ऐसे भी ठहर जाते देखा है।

मानो वह केवल

स्मृतियों में जाग रहा,

एक जन्मसिद्ध समय

जीने से भाग रहा

 

कितनी कठिन यातना है

इस तरह अकस्मात् एक जिन्दा पल का ठहरे रह जाना

वहीं का वही अव्यतीत अघटित अवाक्

और रोज पैदा होते नये-नये वीरानों का चिल्लाना बेजुबान--

बीत, कुछ तो बीत हम पर

जिन्दगी या मौत-सा स्पष्ट,

हमको अनिश्चय से चीरते क्षण. " बीत"


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

एक अजीब दिन

 

आज सारे दिन बाहर घूमता रहा

और कोई दुर्घटना नहीं हुई

आज सारे दिन लोगों से मिलता रहा

और कहीं अपमानित नहीं हुआ

आज सारे दिन सच बोलता रहा

और किसी ने बुरा माना

आज सबका यक़ीन किया

और कहीं धोखा नहीं खाया

 

और सबसे बड़ा चमत्कार तो यह कि

घर लौटकर मैंने किसी और को नहीं

अपने ही को लौटा हुआ पाया


 

 

 

 

 

 

 

अब वो नहीं रहे

 

एक हिसाब है जो उससे जाने कितनी बार

चुकता करवाया जा चुका है।

एक मकान है जो जाने कितनी बार उससे खाली

करवाया जा चुका है

और हर बार उसे

किसी अन्तहीन अदालत में

यह बेमतलब सवाल पूछते रहने के लिए

भटका दिया जाता है

कि आखिर इस सबका मतलब क्या है ?

 

आज सुबह से ही उसके घर के सामने

किसी बेरहम कार्रवाई की सरगर्मी है !

वह जानता है कि वे फिर आनेवाले हैं,

और उसके लिए, बदस्तूर, एक हुक्म लानेवाले हैं

कि अपना घर फ़ौरन खाली करो

 

फिर उसके घर का ताला टूटेगा

फिर उसका सामान फेंका जायगा

फिर कोई दूसरा ताला उसके दरवाजे पर लगेगा

फिर एक खबर फैलेगी शहर भर में

कि उस घर में अब वो नहीं रहते 


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

एक अदद कविता

 

जैसे एक जंगली फूल की आकस्मिकता

मुझमें कौंधकर मुझसे अलग हो गई हो कविता



और मैं छूट गया हूं कहीं

जहन्‍नुम के ख़िलाफ़

एक अदद जुलूस

एक अदद हड़ताल

एक अदद नारा

एक अदद वोट

और अपने को अपने ही

देश की जेब में सम्‍भाले

एक अवमूल्यित नोट

सोचता हुआ कि प्रभो

अब कौन किसे किस-किसके नरक से निकाले ?


 

 

 

 

इंतिज़ाम

 

कल फिर एक हत्या हुई

अजीब परिस्थितियों में।

 

मैं अस्पताल गया

लेकिन वह जगह अस्पताल नहीं थी।

वहाँ मैं डॉक्टर से मिला

लेकिन वह आदमी डॉक्टर नहीं था।

उसने नर्स से कुछ कहा।

लेकिन वह स्त्री नर्स नहीं थी।

फिर वे ऑपरेशन-रूम में गए

लेकिन वह जगह ऑपरेशन-रूम नहीं थी।

वहाँ बेहोश करनेवाला डॉक्टर

पहले ही से मौजूद थामगर वह भी

दरअसल कोई और था।

 

फिर वहाँ एक अधमरा बच्चा लाया गया

जो बीमार नहीं, भूखा था।

 

डॉक्टर ने मेज़ पर से।

ऑपरेशन का चाक़ू उठाया

मगर वह चाक़ू नहीं

जंग लगा भयानक छुरा था।

छुरे को बच्चे के पेट में भोंकते हुए उसने कहा

अब यह बिल्कुल ठीक हो जाएगा।

 


 

 

 

विश्वासघात

 

पहले उसे ऊपर उठाओ

उसकी कोठरी को बुनियाद से उखाड़कर

खाट की तरह सीधा खड़ा कर दो :

फिर उसको उसके घर के बंद किवाड़ों के ऊपर

वह आश्चर्य करेगा

 

उसके दोनों हाथ उसके पीछे बाँध दो,

और एक बेहतरीन झूठ उसकी आंखों पर,

शायद वह कुछ नहीं कहेगा

वह यह मान लेगा कि फ़िलहाल

इसी में उसका भला है

 

अब उसी के कुएँ से निकाल कर लायी गयी।

रस्सी का फन्दा बनाकर

उसके गले में माला की तरह डाल दो

पूजा में रखे घड़े की तरह वह कुछ नहीं करेगा

 

रस्सी का दूसरा सिरा

उसके घर के सामनेवाले पुराने दरख्त से बांध दो

वह तुम दोनों को प्रणाम करेगा

 

अब उससे पूछो वह क्या चाहता है।

और अगर यह केवल अपने घर में शान्ति से रहना चाहता हो

तो चुपचाप उठकर

उसके लिए उसके घर का दरवाजा खोल दो

 

यह छटपटायेगा। लेकिन छटपटाना कोई तर्क नहीं

वह मर गया है, और अब उसमें और तुममें कोई फर्क नहीं 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

ऊँचा उठा सिर

 

उसकी विवशता और छटपटाहट

जिसे एक अन्तहीन मृत्यु ने

अपने सीने से चिपका रखा हो।

 

उसकी लटकी हुई छाती,

धँसा हुआ पेट, झुके हुए कन्धे,

वह कौन है हमेशा जिसकी हिम्मत नहीं

केवल घुटने तोड़े जा सके ?

 

उसके ऊँचे उठे सिर पर एक बोझ रखा है।

काँटों के मुकुट की तरह

बस इतने ही से पहचानता हूँ

 

आज भी

उस मनुष्य की जीत को 


 

 

 

 

 

पूरे की तलाश में

 

तुम जो कभी अपने बायें हाथ की तरह बेवकूफ़ हो

और कभी अपने दाहिने हाथ की तरह चालाक

क्यों एक-दूसरे को एक-दूसरे के खिलाफ़

हाथों या हथियारों की तरह उठाकर

फिर वहीं के वहीं जा पहुँचते हो

जहाँ तुम पहले ही से थे?

 

एक से दूसरी करवट बदलते हुए

- मेरे सोये हाथ

मैंने अक्सर अपने पीछे सुनी है

किसी दरवाजे के बन्द होने की आवाज और फिर

बहुत-सी प्रावाज़ों के एक साथ बन्द हो जाने की

खामोशी

 

खामोशी जिसकी अपनी जबान होती है।

और भयानकता

जैसे एक मटमैली जिल्दोंवाली किताब

अचानक एक रात कहीं से खुल जाय

और बीच में दबी मिले एक कटी हुई जीभ

और वह निकल पड़े अपने बाक़ी हिस्सों की तलाश में 


 

 

 

 

आदमी अध्यवसायी था

 

आदमी अध्यवसायी था' अगर

इतने ही की जयंती मनाकर

सी दी गई उसकी दृष्टि

उसके ही स्वप्न की जड़ों से। उगने पाई

उसकी कोशिशें। बेलोच पत्थरों के मुक़ाबले

कटकर रह गए उसके हाथ

 

तो कौन संस्कार देगा

उन सारे औज़ारों को

जो पत्थरों से ज़्यादा उसको तराशते रहे।

चोटें जिनकी पाशविक खरोंच और घावों को

अपने ऊपर झेलता

और वापस करता विनम्र कर

ताकि एक रूखी कठोरता की

भीतरी सुंदरता किसी तरह बाहर आए।

 

उसको छूती आँखों का अधैर्य कि वह पारस क्यों नहीं

जो छूते ही चीज़ों को सोना कर दे? क्यों खोजना पड़ता है

मिथकों में, वक्रोक्तियों में, श्लेषों में, रूपकों में

झूठ के उल्टी तरफ़ क्यों इतना रास्ता चलना पड़ता है

एक साधारण सचाई तक भी पहुँच पाने के लिए?


 

 

शनाख्त के सिलसिले

 

कोई कोई जिन्दा चीज

खतरे में पड़ती है। दुनिया

जब भी बरामद होती एक लाश की तरह

निकलकर अपने अतीत से -मरों के बीच तमाम

छिन्न-भिन्न सूत्र इकट्ठा होते

एक जबरदस्त माँग में-- "क्या वजह थी

हत्या की ?"

आत्महत्या की ?

सबको शक की नजर से देखते हुए

सच गवारा होता है, कि वे जो

 

फिर एक शनाख्त के सिलसिले में

पकड़कर लाये हैं

किसी दव्बू बनिये को डराये धमकाये

चेहरों के बीच कि वूझ कौन नहीं है निर्दोष इनमें ?

कौन हैं

पूछनेवाले ? कौन होते हैं ?

 

वही जो हमेशा

हर मौके पर

जवान खिचवाकर कुबुलवा सकते हैं किसी से भी,

किसी के लिए भी कि हाँ

यही है वह बदमाश कारीगर

जिसकी उन्हें अरसे से तलाश थी- जिसने

रावण के दसों सिरों पर

मुकुट के बजाय गांधी टोपी रख दी थी

 

जनता का कुसूर नहीं होता उसने तो

हर बार की तरह इस बार भी

सिर्फ़ जला दिया था हंगामों और पटाखों के बीच

रद्दी अखबारों का बना एक पुतला और 


 

 

 

 

 

अपने बजाय

 

रफ़्तार से जीते

को की लीलाप्रद दूरी को लाँघते हुए : या

एक ही कमरे में उड़ते-टूटते लथपथ

दीवारों के बीच

अपने को रोक कर सोचता जब

 

तेज़ से तेज़तर के बीच समय में

किसी दुनियादार आदमी की दुनिया से

हटाकर ध्यान

किसी ध्यान देने वाली बात को,

तब ज़रूरी लगता है ज़िंदा रखना

उस नैतिक अकेलेपन को

जिसमें बंद होकर

प्रार्थना की जाती है

या अपने से सच कहा जाता है

अपने से भागते रहने के बजाय।

मैं जानता हूँ किसी को कानोंकान ख़बर

होगी

यदि टूट जाने दूँ उस नाज़ुक रिश्ते को

जिसने मुझे मेरी ही गवाही से बाँध रखा है,

और किसी बातूनी मौक़े का फ़ायदा उठाकर

उस बहस में लग जाऊँ

जिसमें व्यक्ति अपनी सारी ज़िम्मेदारियों से छूटकर

अपना वकील बन जाता है।


 

 

 

 

मतलब का रिश्ता

 

चमकता सूरज

आइने में कोई दूसरा

आंखों में कोई दूसरा

 

कोई और कहता

मेरी बात औरों से

 

नाव की दिशा में

बहती पूरी की पूरी नदी

 

इतने सार्थक अन्तरों पर धड़कता

कि साफ़ पढ़ा जा सकता

एक दिल सभी में

सभी कुछ में कोई

कभी पत्थर में हमारा दिल

कभी हम पत्थर दिल

 

ताज्जुब कि हम ही उस वक्त भी थे गवाह

जब कुछ खास शब्द पैदा हुए थे

और जिनकी शान के खिलाफ़

हम ही आज हैं घर-घर में उनका खून

यूँ कि जब कहता कि सच कहता

वह झूठ लगता

हमारे बीच मतलब का रिश्ता तो है

मगर उन शब्दों के मतलब का नहीं

जो या तो बीत गया

या था ही नहीं-सा


 

 

 

 

 

 

 

अवकाशप्राप्त समय में

 

वह समय था

जब अपने बारे में चीजों के बयान

स्पष्ट होते हैं, और उनसे

असलियत को छिपाना मुश्किल

वह समय था जब ज्यादा गहरा होता है यक़ीन

चोज़ों से आदमी में

 

जरूरी नहीं थी अब

एक ऐसे एजेंट की तलाश

जो यह तय करवा देता कि मकान

लालबाग़ में बनवाया जाय या कैंसरबाग़ में

 

अब

किसी तरह मिल गये अवकाशप्राप्त समय

और एक साधारण पेन्शन में सिर्फ

एक अन्तिम फ़ैसले की गुंजाइश थी

कि बाकी जीवन

पहले गीता से शुरू किया जाय ?

या पहले रामायण से ?


 

 

 

 

 

 

तुम मेरे हर तरफ़

 

और तुम मेरे हर तरफ़

हर वक्त

इतनी मौजूद:

मेरी दुनिया में

तुम्हारा बराबर आना-जाना

फिर भी ठीक से पहचान में पाना

कि कह सकूं

देखो, यह रही मेरी पहचान

मेरी अपनी बिल्कुल अपनी

सब से पहलेवाली

या सबसे बादवाली

किसी भी चीज की तरह

बिल्कुल स्पष्ट और निश्चित

अब उसे चित्रित करते मेरी उँगलियों के बीच से

निचुड़कर वह जाते दृश्यों के रंग,

लोगों और चीजों के वर्णन

भाषा के बीच की खाली जगहों में गिर जाते

ठहरे पानी के गहरे डूबाव में

एक परछाई एक परत सौर सिकुड़ती

नाम के अँधेरे ठण्डे हाथ

मेरे कन्धों पर बर्फ़ की तरह ठण्डे हाथ

मुझे महसूस करते हैं।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सतहें

 

सतहें इतनी सतही नहीं होतीं

वजहें इतनी वजही

स्पष्ट इतना स्पष्ट ही

कि सतह को मान लिया जाय काग़ज़

और हाथ को कहा जाय हाथ ही

 

जितनी जगह में दिखता है एक हाथ

उसका क्या रिश्ता है उस वाक़ी जगह से

जिसमें कुछ नहीं दिखता है ?

क्या वह हाथ

जो लिख रहा

उतना ही है।

जितना दिख रहा ?

या उसके पीछे एक और हाथ भी है

उसे लिखने के लिए बाध्य करता हुआ ?


बाक़ी कविता

 

पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ

पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है

 

जीवन को पूरी तरह पाने

और पूरी तरह दे जाने के बीच

एक पूरा मृत्यु-चिह्न है

 

बाक़ी कविता

शब्दों से नहीं लिखी जाती,

पूरे अस्तित्व को खींचकर

एक विराम की तरह

कही भी छोड़ दी जाती है...


 


 


 

 

 

 

 

 

 

दो


 

 

 


 

 

चलती हुई सड़कें

 

चलती हुई सड़कें

बोलता हुआ पास-पड़ोस

लड़के के निधन पर आज

शोक ग्रस्त हैं श्री बोस

लिली ने अभी अभी समाप्त किया

'कामिक्स' का एक और पन्ना

"लड़के की शादी पर आापको

सपरिवार आमन्त्रित करते हैं खन्ना "

बैंक में लम्बा ग़बन - क्लर्क पकड़ा गया

सेठ का दिवाला - कोई ग़रीब रगड़ा गया

आधुनिक सेक्स - प्रतीक द्वारा

आत्महत्या - मेरिलीन मनरो

राधानागर

मेरी भव-बाधा हरो

 

कल छुट्टी थी-आज अखबार नहीं

चिट्ठी-तार नहीं

मैं अच्छा लगता हूँ।

धोती में ? या पतलून में ?

बाल घर पर कटवाऊँ ?

या सैलून में ?

कैनेडो की हत्या

हत्यारा गिरफ्तार |

हत्यारे की हत्या

असली हत्यारा फ़रार ?

नौकर छुट्टी पर

मेहमान का तार- रहा हूँ

(आइए, मैं भाड़ में जा रहा हूँ )

सम्पादक की चिट्ठी

"शीघ्र कुछ भेजिए "

(मेहरबान, कुछ आप भी तो भेजिए !)

आज शाम कुछ लोगों से मिलना जरूरी,

आज ही घर पर मुण्डन है- क्षमा करें मजबूरी

 

 

पड़ोसिन जरूरत से ज्यादा कर्कशा है

एक ओर अमरीका तो दूसरी ओर रक्षा है

मुहब्बत एक नशा

तो शादी दुर्दशा है।

भरी-पूरी जिन्दगी बड़े-बड़े काम की

ऐसे गुजरती है जैसे हराम की

धोबी का कुत्ता है - घर को घाट की

आत्महत्या कर लूं कहीं

इस जिन्दगी से ऊब

इसलिए भांग पी और देख डाला 'मेरे महबूब ! '


 

 

लगभग दस बजे रोज़

 

लगभग दस बजे रोज़

वही घटना

फिर घटती है।

वही लोग

उसी तरह

अपने बीवी-बच्चों को अकेला छोड़कर

घरों से बाहर निकल आते हैं। मगर

भूकम्प नहीं आता।

 

शाम होते-होते

वही लोग

उन्हीं घरों में

वापस लौट आते हैं,

शामत के मारे

थके-हारे।

 

मैं जानता हूँ

भूकम्प इस तरह नहीं आएगा। इस तरह

कुछ नहीं होगा।

वे लोग किसी और वजह से डरे हुए हैं।

ये सब बार-बार

उसी एक पहुँचे हुए नतीजे पर पहुँचकर

रह जाएँगे कि झूठ एक कला है, और

हर आदमी कलाकार है जो यथार्थ को नहीं

अपने यथार्थ को

कोई कोई अर्थ देने की कोशिश यें पागल है!

 

कभी-कभी शाम को घर लौटते समय

मेरे मन में एक अमूर्त कला के भयानक संकेत

आसमान से फट पड़ते हैं-जैसे किसी ने

तमाम बदरंग लोगों और चीज़ों को इकट्ठा पीसकर

किसी सपाट जगह पर लीप दिया हो

और रक्त के सरासर जोखिम के विरुद्ध

आदमी के तमाम दबे हुए रंग

खुद--खुद उभर आए हों।

 

 

 

 

 

 

विभक्त व्यक्तित्व ?

वह थक कर बैठ गया जिस जगह
वह पहली, अन्तिम,
नीचे, ऊपर,
यहाँ, वहाँ

कभी लगता-एक कदम आगे सफलता।
कभी लगता-पाँवों के आसपास जल भरता।

सोचता हूँ उससे विदा ले लूँ
वह जो बुरा-सा चिन्तामग्न हिलता डुलता।
वह शायद अन्य है क्योंकि अन्यतम है।

वैसे जीना किस जीने से कम है
जबकि वह कहीं से भी अपने को लौटा ले सकता था
शिखर से साधारण तक,
शब्दों के अर्थजाल से केवल उनके उच्चारण तक।

सिद्धि के रास्ते जब दुनिया घटती
और व्यक्ति बढ़ता है,
कितनी अजीब तरह
अपने-आपसे अलग होना पड़ता है।


 

 

रेखा के दोनों ओर

 

एक बिन्दु से दूसरे तक

एक सीधी रेखा में अगर वह दौड़ता चला जाता

तो भी जगह दो साफ हिस्सों में बँटी हुई दिखती किन्तु

 

शुरू होते ही

चुटकुले - सा चौकोर एक घर,

घर के सामने समानान्तर सड़क,

सड़क के दूसरी ओर दूसरा तजुर्बा

दूसरे रास्ते, चोराहे, दीवारें

और इन्हीं में कहीं बेढंगा फँसा एक त्रिकोण

जिसका जिक्र उसकी कहानियों में काफ़ी बाद तक रहा।

 

इस सबके बावजूद उसने देखा

कि अभी बहुत कुछ हो सकता था

अगर उस पड़ी रेखा पर कही

एक छोटा-सा घेरा बना दिया जाय

इस तरह कि हर अनुभव आधा रेखा पर

आधा उससे ऊपर

 

उसने देखा

कि एक बँधी रेखा पर सीधे बढ़ते जाने से

घेरे को बढ़ाते जाना

उसके वक्त और जगह को अधिक माने देता था,

यानी उसे दूसरों को अधिक देने और पाने देता था

 

दूसरों ने समझा कि वह अधूरा है

लेकिन यह उसकी अपनी शैली थी-

इस तरह अपने को देखना

मानो वह नहीं उसकी वजह से

बाक़ी सब पूरा है 


 

 

 

लखनऊ

किसी नौजवान के जवान तरीक़ों पर त्योरियाँ चढ़ाए
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे, अधमरे बूढ़े-सा खाँसता हुआ लखनऊ।
कॉफ़ी-हाउस, हज़रतगंज, अमीनाबाद और चौक तक
चार तहज़ीबों में बंटा हुआ लखनऊ।

बिना बात बात-बात पर बहस करते हुए-
एक-दूसरे से ऊबे हुए मगर एक-दूसरे को सहते हुए-
एक-दूसरे से बचते हुए पर एक-दूसरे से टकराते हुए-
ग़म पीते हुए और ग़म खाते हुए-
ज़िन्दगी के लिए तरसते कुछ मरे हुए नौजवानोंवाला लखनऊ।

नई शामे-अवध-
दस सेकेण्ड में समझाने-समझनेवाली किसी बात को
क़रीब दो घण्टे की बहस के बाद समझा-समझाया,
अपनी सरपट दौड़ती अक़्ल को
किसी बे-अक़्ल की समझ के छकड़े में जोतकर
हज़रतगंज की सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर थकाया,
ख़्वाहिशों की जगह बहसों से काम चलाया,
और शामे-अवध को शामते-अवध की तरह बिताया।
बाज़ार-
जहां ज़रुरतों का दम घुटता है,
बाज़ार-
जहाँ भीड़ का एक युग चलता है,
सड़कें-
जिन पर जगह नहीं,
भागभाग-
जिसकी वजह नहीं,
महज एक बे-रौनक़ आना-जाना,
यह है-शहर का विसातखाना।

 

 

किसी मुर्दा शानोशौकत की क़ब्र-सा,
किसी बेवा के सब्र-सा,
जर्जर गुम्बदों के ऊपर
अवध की उदास शामों का शामियाना थामे,
किसी तवायफ की ग़ज़ल-सा
हर आनेवाला दिन किसी बीते हुए कल-सा,
कमान-कमर नवाब के झुके हुए
शरीफ आदाब-सा लखनऊ,
खण्डहरों में सिसकते किसी बेगम के शबाब-सा लखनऊ,
बारीक़ मलमल पर कढ़ी हुई बारीक़ियों की तरह
इस शहर की कमज़ोर नफ़ासत,
नवाबी ज़माने की ज़नानी अदाओं में
किसी मनचले को रिझाने के लिए
क़व्वालियां गाती हुई नज़ाक़त :
किसी मरीज़ की तरह नई ज़िन्दगी के लिए तरसता,
सरशार और मजाज़ का लखनऊ,
किसी शौकीन और हाय किसी बेनियाज़ का लखनऊ :

यही है क़िब्ला
हमारा और आपका लखनऊ।


 

 

चिकित्सा

 

ये सब केवल इन्तजार की बेसब्र घड़ियाँ हैं :

मुझे किसी अन्तिम घटना की ओर घसीटती हुई

छोटी छोटी घटनाओं को मजबूत कड़ियां हैं

 

इस प्रतीक्षागृह से लगा हुआ एक और कमरा है

जिसमें एक अजनबी है : या, जो शायद,

एक-दूसरे से ढके हुए अनेक अजनबियों से भरा है

 

मैंने थोड़ा-सा समय अख़बार में पिरो लिया है,

अपनी जिन्दगी के कुछ किमती समय को

किसी दवा के मनहूस विज्ञापन में खो लिया है

 

अभी तक मेरा नम्बर नहीं आया

दूसरे लोग मुझसे पहले जा चुके हैं

पर कोई लौटकर नहीं आया

 

लगता है कमरे के बाहर एक बहुत बड़ा ख्वाब है :

जिन्दगी एक टेढ़ा सवाल है।

मौत जिसका सीधा-सा जवाब है !

 

पर तमाम सवालों को पहुँच से सुरक्षित हूँ इस समय,

दो कमरों के बीच बटी हुई जिन्दगी

बहुत कुछ आशा है, बहुत कुछ भय

 

टूटती हुई हिम्मत विज्ञापनों से बँध नहीं पाती,

पुरानी मैगजीनों के इन उदले हुए पन्नों से

तबीयत घबराती है-उचट उचट जाती

दूसरे कमरे में-

वे लोग मुझसे कुछ नहीं कहते,

वे लोग एक दूसरे से कुछ नही कहते,

वे लोग केवल मुझे अनुमानते हुए एक-दूसरे को देखते हैं,

वे लोग आपस में कुछ समझकर मेरी ओर

सन्देह की दृष्टि फेंकते हैं

 

चलते समय में केवल इतना जान पाता हूँ

कि मृत्यु काली नहीं कोई सफ़ेद चीज है-

किसी नर्स की पोशाक की तरह सफ़ेद - बिल्कुल सफ़ेद

 

 

 

 

 

 

चील

 

अतल में डूबे मनमोजी पंख

एक अक्षर सूने पृष्ठ पर शीर्षक

निरर्थक को सार्थक-सा बनाती।

नटखट गुदगुदी से धीर गम्भीर प्रकाश को हँसाती

 

समास-चिह्न जमीन और प्रासमान के बीच

एक साहसिक दृष्टि से जीवन

ऊँचाई पलायन नहीं, उत्कर्षं

उत्साह के स्तर से

अस्तित्व का सर्वेक्षण-

एक को दूसरे के पास लाती

एक कील पर सारे आकाश को नचाती

 

हवा के कन्धों पर सवार

गली-कूचों के हस्तक्षेपों से परे

दूरबीनी आंखों से देखती हमें

कमबख्तियाँ जीते। खुद, जाने कितने

खतरों पर टिकी डगमगाती

जिन्दगी और मौत के बीच

नन्ही सी जान भूम-झूम जाती 


 

 

हिसाब और किताब

 

मितव्ययी राष्ट्रीय विज्ञप्ति

बीच सड़क पर चिल्लाती : "बचाओ ! बचाओ !

राष्ट्र के लिए बचाओ और छीन लेती मुझसे

मेरा रहा-सहा आराम

जो पहले ही से हराम

 

मुझे रुआँसा देखकर

बीच-बचाव करती

अपने पेशे और मेरे मुल्क के प्रति

पूरी तरह वफ़ादार कोई हस्ती : "डरो मत

सब ठीक हो जायेगा,

जो आज देगा

वह कल पायेगा।"

 

हाथों में लिये फटी क़मीज

घर बिकने तक हम

सही सलामत

हैं नहीं - सिर्फ हिसाब लगाते कि हैं

कही करोड़ों खर्चों के बीच एक फ़जूलखर्च

जिसे अभी बचाया जा सकता है !

 

'कितनी पोढ़ी हो गयी है छाती हमारी

कि अब हम ज़माने का दर्द

इश्क के झूठ की तरह सहते हैं :

कितनी बुजदिली से एक दिल की बात

दूसरे दिल से कहते हैं

 

मेरा मतदान ? जरूर लीजिए,

ग़ुलाम गुलाम है, (चाहे हुकुम का हो)

और बादशाह बादशाह

इनके बीच कौन पूछे उन खस्त:हालों को

जिन्हें ' सिताइश की तमन्ना न सिलः की

परवाह' !


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चीजें और आदमी

 

बाहर से तमाम चीजें आकर

घर में भर गयीं

चलने-फिरनेवाली चीजों के रास्ते से अलग

कुर्सियां बैठ गयीं

पर्दे पड़ गये

तसवीरें लग गयीं

किताबें सोचने लगीं

कितना बड़ा मकान है

कितना इतमिनान है"

इतने में वहाँ एक आदमी

भुन्नाता हुआ आया

और लगा कि हर चीज़ ने उसे किसी

मुसीबत की तरह उठाया 


 

 

 

 

 

 

 

 

अधूरे समझौते

 

कितने उदार हैं निवासी इस क़स्बे के

कि पहले ही से तैयार

तमाम बुजुर्ग रायों के बावजूद

आज फिर शुरू से सोचने का मौक़ा मिला।

 

अपने को बदलकर,

या फिर से पाकर,

उस सारे अपवाद से घनिष्ठता

जो अब कहानी हो गयी है

यानी कितने अर्थ हो सकते थे इसी वर्षा के

जो अब जैसे-तैसे बरसकर पानी हो गयी है

 

कहाँ वे अनोखे संकल्प

कि सबकुछ नये सिरे से ...

कहाँ ये टूटे प्रयास

कि गनीमत को ही पूर्ण उपलब्धि कहना पड़ता है


 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुचित लगता है अब

 

अनुचित लगता है अब

उचित और अनुचित में भेद करना

बेमतलब सफ़ेद को स्याह

और स्याह को सफ़ेद करना

जमीन की प्रार्थना से

आसमान में छेद करना

कुछ भी कर गुजरने के बाद

कुछ भी खेद करना

असंगत या न्यायसंगत हो जरूरी नहीं,

घात निश्चयात्मक हो

'शायद' से शुरू होकर हर दलील

अन्त में नकारात्मक हो

बेमानी लगती है अब

किसी भी पानी की खोज

मदारी की डुगडुगी की तरह शब्दों का इस्तेमाल,

जबकि हम अभी और नंगे हो सकते हैं

खींचकर एक-दूसरे की खाल""


 

 

 

 

 

ज़रूरतों के नाम पर

क्योंकि मैं ग़लत को ग़लत साबित कर देता हूं
इसलिए हर बहस के बाद
ग़लतफ़हमियों के बीच
बिलकुल अकेला छोड़ दिया जाता हूं
वह सब कर दिखाने को
जो सब कह दिखाया
वे जो अपने से जीत नहीं पाते
सही बात का जीतना भी सह नहीं पाते
और उनकी असहिष्णुता के बीच
में किसी अपमानजनक नाते की तरह
बेमुरव्वत तोड़ दिया जाता हूँ
प्रत्येक रोचक प्रसंग से हटाकर,
शिक्षाप्रद पुस्तकों की सुची की तरह
घरेलू उपन्यासों के अन्त में
लापरवाही से जोड़ दिया जाता हूँ

वे सब मिलकर
मेरी बहस की हत्या कर डालते हैं
ज़रूरतों के नाम पर
और पूछते हैं कि ज़िन्दगी क्या है
ज़िन्दगी को बदनाम कर


 

 

 

 

 

 

 

लाउडस्‍पीकर

मुहल्ले के कुछ लोग लाउडस्पी‍कर पर
रात भर
कीर्तन-भजन करते रहे।
मुहल्ले के कुत्ते लड़ते-झगड़ते
रात भर
शांति-भंजन करते रहे।
मुझे ख़ुशी थी कि लोग भूंक नहीं रहे थे
(
कीर्तन तो अच्छी चीज़ है)
और कुत्तों के सामने लाउडस्पीहकर नहीं थे।
(
गो कि भूंकना भी सच्ची चीज़ है।)


 

 

 

 

 

 

 

ताला

 

सुनते हैं एक समय में लोग

घरों में ताला नहीं लगाते थे

लेकिन जब से रोजगारों ने

आदमी को सँभाला

घरों में

बाजारों में

जहाँ देखो ताला ही ताला

 

आजादी एक बन्दोवस्त है

तीन पायों की कुर्सी की तरह निरुपाय

जिसका चौथा और सबसे भारी पाया

भरी तिजोरियों पर लगा ताला

किसी करवट बैठो, असली दबाव

पड़ता है वहीं लामहाला

 

वक्त नाजुक है।

मगर कविता की तरह नाजुक नहीं

 

सोचता हूँ ये किस धन्धे में हाथ डाला

कि मुंह खोलते ही याद आता है दुकान का ताला


 

 

आसन्न संकट में 

 

जब भी मुझे अपने होने का वहम होता

में चीखता हूँ।

अपने में किसी डर को बुरी तरह भरकर

अपनी औकात के बाहर मौतों की मौजूदगी के बावजूद

मुझे अँधेरे के थर्राने की आवाज पसन्द है

एक फूल की खूबसूरती से ज्यादा

खूबसूरत होती है उसकी हिम्मत

 

क्या रवैया हो आसन्न संकट में ?

बार-बार

पिछड़े सवालों के पचड़े रद्दी अखबारों में बांधे

"आखिर कहाँ फेंके" की झ़झट

कन्धों पर लादे सोचती है दुनियाये कूड़ा करकट

 

अजीव दबावों से दब दबा कर

जब होते जाते (हम करते नहीं) टेढ़े मेढ़े सवाल

बलिदानी मौकों पर फटेहाल

(यूँ ही मर रहे सब असाध्य बीमारियों से लड़ते लड़ाई) शब्द

बिच्छुषों की तरह डंक मारते हमारी चेतावनी

दूसरों से ज्यादा हमें ही सावधान करती,

हमारी चुप्पी

हमारे ही घर की

एक वारदात होकर रह जाती

 

जब भी

शराफ़त को क्रोध की तरह तपाकर

किसी का कुछ बिगाड़ना चाहता हूँ

बिगड़कर रह जाती बिगड़ने की आदत

बुझकर रह जाती किसी फिसड्डी सुभाव में

यह भी देख सकने की ताक़त

कि अलग अलग जुनून हैं कविता,

हिम्मत और बौखलाहट

 

 

पचास करोड़ उद्योगधन्धों से लथपथ समझ को

जब भी इस्तेमाल करना चाहता हूँ

किमी खास तरह

तब लगता है।

कहीं यह भी कोई जुर्म हो

बहुतों के मामलो में

बहुतों से अलग राय रखना !


 

 

 

 

 

खेल

 

खेल कुछ नहीं आदमी खेल था

और खेल था वह मंच जो आदमी ने बनाया

आदमी का खेल दिखाने के लिए

सब जानते कि सब खेल है।

हाथों की सफाई

नजरों का धोखा और नज़रों की दुहाई !

 

जादूगर भी जानता कि सब जानते

फिर भी धोखा खाते सब जानकर

झूठ को सच मानकर कुछ घण्टे

कुछ घण्टे भी बहुत होते

लोग अगर मौका दें तो साबित हो जाय

कि धोखा वहाँ भी है जहाँ वे समझते

कि नहीं है उनके जाँचने और जानने के बीच

 

देखते देखते छल सकती मामूली चीजें

बेमानी आवाजें

जादू का काम करें

हमारी अक्ल को हमारी ही अक्ल से

हैरान करें हम किसी चीज को

बाहर ढूंढते रहे परेशान जब कि

वह हो हमारे पास ही

और अन्त हम

जादूगर पर ताज्जुब करते घर लौट

अपने पर नहीं


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गाय

 

सब से डरती गाय

घास चरती गाय

दूध देती गाय |

 

दूध पीता बच्चा

दूध पीती बिल्ली

दूध पीता सांप।

 

माँ, मुझको डर लगता :

मेरा घर

कैसे कैसे जीवों का घर लगता !


 

 

 

 

 

 

 

 

 

एक मौसम

 

आसमानी फलक

विल्कुल साफ़ था ...

कि मौसम धूपछाँही रंगों में

तसवीर-सा उभर आया

 

इच्छाओ के ठीक मुताविक

उस खामोशी की एकतरफ़ा जिद को

मुआफ़ करता-सा वृक्ष का आयोजन

 

जमीन और मौसम की

बेढंगी बनावट में

फूलों के लाल छोंटों से

खूब था

उनका बिल्कुल उसी तरह होना

और फिर हमेशा के लिए

असमाप्त छूट जाना ....

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

एक हरा जंगल

एक हरा जंगल धमनियों में जलता है।
तुम्हारे आँचल में आग
                 चाहता हूँ झपटकर अलग कर दूँ तुम्हें
उन तमाम संदर्भों से जिनमें तुम बेचैन हो
और राख हो जाने से पहले ही
उस सारे दृश्य को बचाकर
किसी दूसरी दुनिया के अपने आविष्कार में शामिल कर लूँ


लपटें

एक नए तट की शीतल सदाशयता को छूकर लौट जाएँ।


 

 

 

 

 

 

 

अकेली खुशी

 

लगता है प्रकृति नहीं यह

कोई आदिम महोत्सव है आज

जिसके किसी जादू-टोने के असर से

मैं खुश नहीं, खुश-सा पड़ गया हूँ दो क्षण

 

जी चाहता है तुम मेरे पास होती,

मेरे सिरहाने एक सह-अनुभूति - एक पहचानी हुई आवाज

और हम स्वीकारते अनुग्रहीत

इस प्रसन्न वनश्री का खुला हुआ आमन्त्रण |

 

ये झरनों का खेल-कूद,

ये हर्ष से महकता हुआ वन,

ये ठण्डी हवामों के साथ

चीड़ के जंगलों में भटकता हुआ मन,

ये बूंदों के घुंघरू -उमंग भरे बादल,

ये रिमझिम का राग गुनगुनाता हुआ जंगल."

 

क्या तुम्हें मालुम है, मेरे प्यार,

कि दर्द के अकेलेपन से कहीं अधिक

असह्य हो सकता है कभी कभी

खुशी का अकेलापन ?


 

 

 

 

 

 

 

 

दूर तक

अंधेरे को अचानक फूल बनाती हुई सुगन्ध

सुगन्ध को रूप देते हुए रंग

रंगों को एक चमक देता हुआ मौसम

मौसम को गोद देती हुई जमीन

जमीन को भर देते हुए बादल

बादल को आकाश देती हुई हवा."

आओ इन सबको अपने में भरकर

दूर तक फैल जायें


 

 

 

 

 

 

 

 

डूबते देखा समय को

डूबते देखा समय को
जो अभी अभी सूर्य था

 

अपने में अस्त मैं,

शाम में इस तरह व्यस्त
कि जैसे वह हुई नहीं-मैंने की,
उसके व्यर्थ रंगों को
एक साहसिक योजना दी।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पहले भी आया हूँ

 

जैसे इन जगहों में पहले भी आया हूँ

बीता हूँ

जैसे इन महलों में कोई आने को था

मन अपनी मनमानी खुशियाँ पाने को था !

लगता है

इन बनतीमिटती छायाओं में तड़पा हूँ

किया है इन्तजार

दी हैं सदियाँ गुजार

बार-बार

इन खाली जगहों में भर-भर कर रीता हूँ

रह-रह पछताया हूँ

पहले भी आया हूँ

बीता हूँ


 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्रावस्ती

 

समय के समतल उतरकर

हाथ जोड़े-सी गुज़रती

एक नतमस्तक अपरिचित शाम

 

यूं ही याद भाती

वे खांगाली सभ्यताएँ खंडहरों की तूंबियों में..-

नहीं,

कुछ अब भी बची है कीर्ति-गाथा,

जिस तरह प्रक्षितिज सहसा गूंजकर

गूँजता रह जाय कोई चक्रवर्ती नाम

 

जेतवन की परिव्राजक हवाओं में

आह, उन अनुपस्थितियों का स्पर्श,

जिनके बाद भी अस्तित्व में कुछ अर्थ बाक़ी है।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

मस्तकविहीन बुद्ध प्रतिमा

 

जिसको तुम्हें तलाश है

एक अत्यन्त प्राचीन छुरा

आज भी घंसा पड़ा है कहीं

समय की पसलियों में

 

बुद्ध के तस्करों

विदेशियों की उत्सुकता से

कई बार पहले भी

शुरू की जा चुकी है।

हमारी कहानी -

 

एक मस्तक शिखर किरीट

एक प्रभा मण्डल |

एक पुराकथा या एक सोने की चिड़िया

कई बार पहले भी लुटेरे

खाली उस सिर के लिए आये हैं

और खाली सिर लेकर लौट गये !


 

 

 

 

 

 

 

 

कोणार्क

 

सुख-मुग्ध अलस आकृतियाँ,

विलसित काम-मुद्राएँ

देव-रक्षित काल-मुक्त

एक प्रतीन्द्रिय तन्मयता के मांसल संकेतों में कहतीं

कि जीवन अह्लाद है, शर्म नहीं

 

यह जो इन निर्विकार प्रस्तर प्रतिमानों को अर्पित कर

प्रसाद-रूप ग्रहण हुआ-

हम जीवन के वशीभूत देवतुल्य

उन्हीं स्फुलिंग सुखों के सहभोक्ता है :

अन्धी गुफाथों में मुंह ढाँके धर्म नहीं

 

ये महान शिलाचित्र,

सूर्य के प्रकाश में

अकुण्ठित आत्मा की निष्काम व्याख्या हैं :

जीवन की भरपूर स्वीकृति,

लाखों विरोधों में

किसी आधार- संगीत की अनुकृति 

 

 


 

 

 

 

 

 

रास्ते (फतेहपुर सीकरी)

वे लोग कहाँ जाने की जल्दी में थे
जो अपना सामान बीच रास्तों में रखकर भूल गए हैं?
नहीं, यह मत कहो कि इन्हीं रास्तों से
हज़ारों-हज़ारों फूल गए हैं
वह आकस्मिक विदा (कदाचित व्यक्तिगत !)
जो शायद जाने की जल्दी में फिर आने की बात थी।

ये रास्ते, जो कभी खास रास्ते थे,
अब आम रास्ते नहीं।
ये महल, जो बादशाहों के लिए थे
अब किसी के वास्ते नहीं।

आश्चर्य, कि उन बेताब ज़िन्दगियों में
सब्र की गुंजाइश थी
और ऐसा सब्र कि अब ये पत्थर भी ऊब रहे हैं।

 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

अनात्मा देह (फतेहपुर सीकरी)

इन परछाइयों के अलावा भी कोई साथ है।
सीढ़ियों पर चढ़ते हुए लगता है
कि वहाँ कोई है, जहाँ पहुँचूँगा।

मुंडेरों के कन्धे हिलते हैं,
झरोखे झाँकते हैं,
दीवारें सुनती हैं,
मेहराबें जमुहाई लेती,
गुम्बद, ताज़ियों के गुम्बद की तरह
हवा में कांपते हैं।

तालाब के सेवार-वन में जल की परछाईयां चंचल हैं,
हरी काई के कालीन पर एक अनात्मा देह लेटी है
और मीनारें चाहती हैं
कि लुढ़ककर उसके उरोजों को चूम लें।


 

 

सोने का नगर

वह तलछट है जहाँ श्रात्मदया, परिप्रेक्ष्य में

जिन्दगी नहीं

ज़िन्दगी को रट पर चढ़ी हुई कच्ची रंगमयता

जो छूटती चली गयी

 

काम और नाकाम में विभाजित

अपने कुल किये का भाग्यफल

अपनी ही अंगमयता के लिए लालायित

वही जो रोज-रोज होता

पर व्यतीत नहीं होता है।

एक अनुभव- तमाम अनुभवों को चबाकर

नीरस थूक रहा है

जो शब्दों के खोखल

साँस भर ताकत छटपटाने के लिए

उस जमीन पर विजय पाने के लिए

 

जिसे जीतने घूम से निकले थे

हवा को रीदते घुड़सवार

और स्वर्ग के स्वामी इन्द्र ने

किये थे उल्का से प्रहार"

 

हाँ, परिचित हूँ उस जमीन से

जो भोग गयी थी हवाई बादलों से,

और देख रहा हूँ बुझी घाँखों से

उस घधकते आकाश को भी

जहाँ शताब्दियों झुलस जाती हैं

 

पहली दिग्विजय का वह भूरा धुंधला फाटक

घोसा थापहला घोसा - जिसके बाद

सोने का नगर नहीं

केवल एक उजाड़ रूसी वापसी...


 


 


 

 

 

 

तीन


 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

 

 

दिल्ली की तरफ़

जिधर घुड़सवारों का रुख हो
उसी ओर घिसटकर जाते हुए
मैंने उसे कई बार पहले भी देखा है।

दोनों हाथ बंधे, मज़बूरी में, फिर एक बार
कौन था वह? कह नहीं सकता
क्योंकि केवल दो बंधे हुए हाथ ही
दिल्ली पहुँचे थे।














क़ुतुबमीनार

 

क्या हम अभी भी

उन्हीं नीचाइयों में खड़े हैं

जहाँ ऊँचाइयों का असर पड़ता है ?

 

क्या ये सीढ़ियाँ हमें

उस सबसे ऊँची वाली जगह पर पहुँचा सकती हैं।

जहाँ मीनारें खत्म हो जातीं

और एक मस्तक शुरू होता

ताजपोशी के लिए ?

 

मेरे हाथों में एक दूरबीन है। मीनार

जिसके एक तरफ़ से मैं

इतिहास के तमाम सितारों को देख रहा हूँ-

उनके संसार जो अभी तक कहीं

समय के चौथे आयाम में लकदक हैं

 

 

क्या मैं फिर किसी नये सितारे के समारोह में शामिल हूँ ?

या अँधेरी रातों में तारे गिन रहा हूँ ?


 

 

 

 

इब्नेबतूता

माबर के जंगलों में
सोचता इब्नेबतूता-पैने बांसों की सूलियों में बिंधे
               कौन हैं ये जिनके शरीर से रक्त चूता?

दिन में भी इतना अंधेरा
या सुल्तान अन्धा है
जिसकी अन्धीा आँखों से मैं देख रहा हूँ
मशाल की फीकी रोशनी में छटपटाता
तवारीख का एक पन्नाा?-
इस बर्बर समारोह में
कौन हैं ये अधमरे बच्चे, औरतें जिनके बेदम शरीरों से
हाथ पाँव एक एक कर अलग किए जा रहे हैं?
       काफ़िर? या मनुष्य? कौन हैं ये
                 मेरे इर्द गिर्द जो
       शरियत के खिलाफ़
                 शराब पिए जा रहे हैं?

कोई नहीं। कुछ नहीं। यह सब
                      एक गन्दा ख्वाब है
यह सब आज का नहीं
                      आज से बहुत पहले का इतिहास है
                      आदिम दरिन्दों का
                      जिसका मैं साक्षी नहीं सुल्तान,
                               मुझे इजाज़त दो,
                               मेरी नमाज़ का वक़्त है।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आज भी

 

उसके यह सन्देह प्रकट करते ही कि पृथ्वी नहीं

शायद सूरज ही घूमता हो

पृथ्वी के चारों ओर !

उसके चारों और इकट्ठा होने लगते

उतावले लोग। फिर एक बार

गैलीलियो की तरह

उसकी हत्या के लिए उतावले लोग

 

झूठ या सच से नहीं

इस तरह यक़ीन रखने वालों के बहुमत से

डरता हूँ

आज भी !


 

 

 

 

 

फ़ौजी तैयारी

 

हज़ारों साल से उसी एक पिटते हुए आदमी को

उसी एक पिटे हुए सवाल की तरह

उसी से पूछा जा रहा है

तुम कौन हो?

कहाँ रहते हो?

तुम्हारा नाम क्या है?''

किसी आठ अचल कोनों वाली कोठरी में

गश्त लगाकर क़ैदी

एक साथ तीन पहरेदारों को क़ैद किए हैं।

 

बाहर

चुंबक की अदृश्य रेखाओं की तरह फैला है

सींकचों का पकड़िया जंगल।

 

और यह एक ज़बरदस्त फ़ौजी इंतज़ाम की

क़ामयाबी का पक्का सबूत है

कि बंदूक हाथ में लेते ही

हमें चारों तरफ़ दुश्मनों के सिर

अपने आप नज़र आने लगते।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बर्बरों का आगमन

 

अब किसी भी बात को लेकर

चिन्ता करना व्यर्थ है वे गये हैं।

उन्होंने फिर एक बार हमें जीत लिया है।

 

उनके अफसर, सिपाही और कोतवाल -

उनके सलाहकार, मसखरे और नक्काल -

उनके दरबारी और उनके नमकहलाल -

उनके मुसाहिब, खुशामदी और दलाल  -

चारों तरफ़ छा गये हैं

वे सब के सब

वापस गये हैं

शहर की सभी खास और ग्राम जगहों पर उनका कब्जा है।

उनके जत्थे अब

लूट की खुली छूट के लिए बेताब हैं।


 

 

 

 

 

 

 

 

वियतनाम

 

कितने विषाक्त अनुभवों को दोहराता

सिर उठाता सर्प-बोध कि आओ,

फिर डसें, जहर भी इलाज है।

विस्थापित युग की धमाचौकड़ी में ग़लत

किन्तु सही-सा

एक तर्क युद्ध है,

बुद्ध है ईसा

 

बार-बार चाटते

हत्या के चरफराते स्वाद को

जवान पर धधकती है जंगल की आग |

गोलियों और धमाकों के बीच

एक झुलसे हुए वार्तालाप की कोशिश-

"ठहरो, यह मत करो,

हमें इसका उत्तर देना होगा

विज्ञापन के चतुर लहजों में नहीं

किसी घायल बच्चे के दर्द-सी सादी भाषा में

कि कौन-सी मृत्यु अनिवार्य है ?"


 

 

 

 

 

 

काले लोग

 

सुना है वे भी इन्सान है, मगर काले हैं,

जिन्हें कुछ गोरे जानवरों की तरह पाले हैं

आदमी की किताब में इनकी भी

एक जात होती है-एक प्रकार होता है,

और इनकी असभ्यता से भी ज्यादा खतरनाक

सभ्यता में इनका शिकार होता है

 

ये तरह-तरह मारे जाते हैं !

कभी कानून के शिकंजे में फँसाकर,

कभी मादक द्रव्यों से हँसा हँसाकर

कभी घेरकर, कभी थकाकर,

कभी छेड़कर, कभी सताकर,

कभी फांसी-कभी गोली -कभी छुरी-

जब जैसा मौक़ा - जब जैसे जरूरी ...

 

सुना है ये गा भी सकते हैं,

नाच भी सकते हैं,

पढ़ भी सकते हैं,

लिख भी सकते है,

प्रार्थना कर सकते हैं,

नारे लगा सकते है,

मगर आदमी की तरह चल नहीं सकते,

अपना रंग बदल सकते हैं


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आज का जमाना

 

वही शायद फिर गया है लौटकर

मेरे दरवाजे पर मुझे पुकार-पुकारकर जगाता हुआ

गुलामों और सुल्तानों का जमाना

 

आज चांदनी चौक में बड़ी भीड़ है

लाल किले से जामा मस्जिद तक

इन्तजाम किया जा रहा है कि

लोग खड़े हों एक पाँव पर

कोरनिश के लिए।

 

इन्तज़ार के लम्बे रास्तों पर खड़ी हैं

निकाली हुई एक जोड़ा पुरानी आँखें

कि देखें आज

किसकी सवारी निकलती है !

 


 

 

 

 

 

 

 

 

लापता का हुलिया

रंग गेहुआं ढंग खेतिहर
              उसके माथे पर चोट का निशान
कद पांच फुट से कम नहीं


ऐसी बात करता कि उसे कोई ग़म नहीं।
तुतलाता है।
उम्र पूछो तो हज़ारों साल से कुछ ज्यादा बतलाता है।
देखने में पागल-सा लगताहै नहीं।
कई बार ऊंचाइयों से गिर कर टूट चुका है

इसलिए देखने पर जुड़ा हुआ लगेगा

हिन्दुस्तान के नक़्शे की तरह।


 

 

 

 

 

 

 

भागते हुए

 

जहां पहले हमलों का काम था

वहाँ अब एक अंधेरा जंगल है

जहाँ द्विविधाओ का दलदल था और लूटने लुटने का भ्रम

वहाँ अब केवल एक गहरी उदासी का डुबाब है।

हमेशा की तरह

वैभव और जोर-जबरदस्ती का रास्ता

एक बहुत ठण्डी और अँधेरी घाटी में पहुँचकर

अचानक कहाँ खो जाता है ?

 

हाँफते हुए राजमार्गों से नहीं

उलझी हुई पगडण्डियों से बार-बार पहुँचना

विदग्ध सम्राटों की तरह या मामूली डाकू की तरह

खोजते हुए वाल्मीकि का आश्रम... रौनकों से हटकर...

ललछोना के जंगल में घेरकर उनका घर

जिन्हें जिन्दा जला दिया था

वे तो सचमुच गरीब निकले। उनके पास कुछ भी था

सिवाय उनकी पहले ही से

जली हुई ठठरियों के

 

उनका सामान लेकर ! रातोंरात

अँधेरे में सेंध लगा कर भाग निकलने की बेचारी कोशिश


 

 

 

 

काफ़ी बाद

हमेशा की तरह इस बार भी
पुलिस पहुँच गई थी घटनास्थल पर
घटना के काफ़ी बाद
ताकि इतिहास को सही-सही लिखा जा सके
चश्मदीद गवाहों के बयानों के मुताबिक
एक पूरी तरह जल चुकी चिता
और पूरी तरह जल चुकी लाशों के सिवाय
अब वहाँ कोई था गवाह
जिसने अपनी आँखों से देखा हो
             उन बूढ़े, जवान, बच्चों को जिन्होंने उत्साह से चिता

                                 बनाई थी
उन लोगों को जिन्होंने मिलकर चिता में आग

                                 लगाई थी

और उन हत्यारों को जिन्होंने कुछ बेबस इनसानों

को लपटों में झोंक झोंक कर होली मनाई थी

 

यह सब कहाँ हुआ? इसी देश में।
यह सब क्यों होता है किसी देश में?-

बेल्सेन में - बियाफ्रा में - बेलची में -

वियतनाम में - बांगला देश में -


 

 

 

सन्नाटा या शोर

कितना अजीब है
अपने ही सिरहाने बैठकर
अपने को गहरी नींद में सोते हुए देखना।
             यह रोशनी नहीं
             मेरा घर जल रहा है।
             मेरे ज़ख्मी पाँवों को एक लम्बा रास्ता
             निगल रहा है।
             मेरी आँखें नावों की तरह
             एक अंधेरे महासागर को पार कर रही हैं।

यह पत्थर नहीं
मेरी चकनाचूर शक्ल का एक टुकड़ा है।
मेरे धड़ का पदस्थल
उसके नीचे गड़ा है।
मेरा मुंह एक बन्द तहखाना है। मेरे अन्दर
शब्दों का एक गुम खज़ाना है। बाहर
एक भारी फ्त्थर के नीचे दबे पड़े
किसी वैतालिक अक्लदान में चाभियों की तरह
मेरी कटी उँगलियों के टुकड़े।

क्या मैं अपना मुँह खोल पा रहा हूँ?
क्या मैं कुछ भी बोल पा रहा हूँ?

लगातार सांयसांयमुझमें यह
सन्नाटा गूंजता है कि शोर?
इन आहटों और घबराहटों के पीछे
कोई हमदर्द है कि चोर?
लगता है मेरे कानों के बीच एक पाताल है
जिसमें मैं लगातार गिरता चला जा रहा हूँ।


 

 

मेरी बाईं तरफ़
क्या मेरा बायां हाथ है?
मेरा दाहिना हाथ
क्या मेरे ही साथ है?
या मेरे हाथों के बल्लों से
मेरे ही सिर को
गेंद की तरह खेला जा रहा है?

मैं जो कुछ भी कर पा रहा हूँ
वह विष्टा है या विचार?
मैं दो पांवों पर खड़ा हूं या चार?
क्या मैं खुशबू और बदबू में फ़र्क कर पा रहा हूँ?
क्या वह सबसे ऊँची नाक मेरी ही है
जिसकी सीध में
             मैं सीधा चला जा रहा हूँ?


 

 

वह कभी नहीं सोया

वह जगह
जहाँ से मेरे मन में यह द्विविधा आई
कि अब यह खोज हमें आगे नहीं बढ़ा पा रही
मेरे घर के बिल्कुल पास ही थी।

वह घाटी नहीं तलहटी थी
जिसे हमने खोद निकाला था-
और जिसे खोद निकालने की धुन में
हम सैकड़ों साल पीछे गड़ते चले जा रहे थे
इतनी दूर और इतने गहरे
कि अब हमारी खोज में हमें ही खोज पाना मुश्किल था।

शायद वहीं एक सभ्यता का अतीत हमसे विदा हुआ था
जहाँ साँस लेने में पहली बार मुझे
दिक़्क़त महसूस हुई थी
और मैं बेतहाशा भागा था
उस ज़रा-से दिखते आसमान, वर्तमान और खुली हवा की ओर
जो धीरे-धीरे मुँदते चले जा रहे थे।

एक खोज कहाँ से शुरू होती और कहाँ समाप्त
इतना जान लेने के बाद क्या है और क्या् नहीं
यहीं से शुरू होती आदमी की खोज,
उसकी रोज़मर्रा कोशिश
कि वह कैसे ज़िन्दा रहे उन तमाम लड़ाईयों के बीच
जो उसकी नहीं-जो उसके लिए भी नहीं-जिनमें
वह योद्धा कहलाए कायर,
केवल अपना फर्ज़ अदा करता चला जाए
ईमानदारी से
और फिर भी अपने ही घर की दीवारों में वह
ज़िन्दा चुनवा दिया जाए।


 

 

वह अचानक ही मिल गया।
कुछ निजी कारणों से उसने
अपना नाम नहीं केवल नम्बर बताया।
इतिहास देखकर जब वह वर्षों ऊब गया
उसने अपने लिए क़ब्रनुमा एक कमरा बनाया
और एक बहुत भारी पत्थर को ओढ़कर सो गया।

वह फिर कभी नहीं जागा, यद्यपि उसे देखकर लगता था
कि वह कभी नहीं सोया था। उस ठण्डी सीली जगह में
उसकी अपलक आँखों का अमानुषिक दबाव, उसकी आकृति,
उसकी व्यवहारहीन भाषा - कुछ संकेत भर शेष थे
कि वह पत्थर नहीं आदमी था
और हज़ारों साल से आदमी की तरह
ज़िन्दा रहने की कोशिश कर रहा था।


 

 

 

उस टीले तक

जेबों में कुछ पुराने सिक्के,
हाथों में लगाम,
लंगड़ाते टट्टूयों पर सवार,
ऊबड़ खाबड़ सफ़र तय करते
हमने जिस टीले पर पहुँचकर पड़ाव किया
              कहते हैं वहीं से सिकन्दर ने अपने घर वापस
              लौटने की कोशिश की थी!

घर’- मैंने इस शब्द की व्याकुल गूँज को
अक्सर ऐसी जगहों पर सुना है
जो कभी किसी विजेता के जीतों की अंतिम हद रही है।

लेकिन हम वहाँ विल्कुल उल्टे रास्ते से पहुँचे थे
और बिल्कुल अकस्मात्। यानी कोई इरादा था
कि हम वहीं खड़े होकर, भूखे प्यासे बच्चों से घिरे,
उस उजाड़ जगह का मुआयना करते हुए
सिकन्दर के भूत वा भविष्य के बारे में अनुमान लगाते।
नहीं, हम अब और आगे नहीं जा सकते,
हम बेहद थक चुके हैं, हम घर पहुँचना चाहते हैं
उन सबने मिलकर
लगभग बग़ावत कर दी थी। अगर मैं सिकन्दर होता
तो मुमकिन है उस रात उन तेरहों का खून कर देता
जो पीछे लौटनेवालों के अगुवा थे। हमने
वह सीमा क़रीब क़रीब ढूंढ़ ही निकाली थी
जहाँ तक सिकन्दर पहुँचा था।


 

 

 

 

 

पूरा जंगल

 

पूरा जंगल उसकी नीद की शान्ति है

एक जनते जन्मते क्षण में द्विविधाग्रस्त हूँ-

किसे रोशनी कहूं ? किसे अँधेरा ?

किसे शिकार कहूँ ? किसे शिकारी ?

किसे शिखर कहूँ ? किसे धरातल ?

 

अँधेरे को काटती उसकी आंखों की लौ

छाया है ? या उसकी छाया में उजाला

उसका बदन ? हांफता

पूरा वजन जागता जम्हाई लेकर

                   सतर्क पूरा वन

उसकी गति है, छलांग है, महक है

और कितनी तरह है वह और उसकी पहचान का जोखिम

आग और पानी में दमक दाँतों की

लपलपाती एक साथ शुष्क तरल रक्त-बुझी

उसकी जीभ

पेड़ों झुरमुटों में बहती हवा

धीरे-धीरे गुजरती देह

ऊँघती उसकी आंखें-

निमग्नता है, शान्ति है, दया है,

क्रूरता है, उपेक्षा है,

वह भयानक है

वह सुन्दर है

वह तटस्थ है

 

उसकी तटस्थता उसका पूरा जंगल है 

 


 


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